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गांधी के कहने पर नेहरू कांग्रेस अध्यक्ष बने

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नेहरू के साथ नेताजी सुभाष बोस

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नेहरू के साथ नेताजी सुभाष चंद्र बोस.

नेहरू और सुभाष चंद्र बोस एक दूसरे के आठ साल के अंतराल पर पैदा हुए थे, नेहरू 14 नवंबर 1889 को बोस 23 जनवरी, 1897 को. नेहरू ने अपनी ज़िंदगी के शुरुआती दिन इलाहाबाद में बिताए थे जबकि सुभाष का आरंभिक जीवन ओडिशा के शहर कटक में बीता था.

दोनों नेता संपन्न परिवारों में पैदा हुए थे. जवाहरलाल के पिता मोतीलाल नेहरू और सुभाष के पिता जानकीनाथ बोस दोनों नामी वकील थे. जवाहरलाल अपने माता-पिता के अकेले बेटे थे जबकि सुभाष बोस के नौ भाई बहन थे.

जवाहरलाल नेहरू और सुभाष चंद्र बोस, दोनों बहुत अच्छे छात्र थे. कटक से कलकत्ता आकर बोस ने मशहूर प्रेसिडेंसी कॉलेज में दाखिला लिया था.

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वहाँ जब एक अंग्रेज़ अध्यापक ने एक छात्र के साथ दुर्व्यवहार किया तो उन्होंने प्रधानाध्यापक से मिलकर माँग की कि वो अध्यापक अपने इस काम के लिए माफ़ी माँगें. लेकिन इसके लिए सुभाष बोस को ही कॉलेज से निष्कासित कर दिया गया.

बाद में उन्होंने स्कॉटिश चर्च कॉलेज में दाखिला लिया जहाँ उन्होंने बीए की परीक्षा में विश्वविद्यालय में दूसरा स्थान प्राप्त किया.

सुभाष चंद्र बोस ने लंदन में आईसीएस की परीक्षा भी दी जहाँ उन्हें मेरिट लिस्ट में चौथा स्थान मिला.

नेहरू जब केंब्रिज से पढ़कर भारत लौटे तो उनकी उम्र 23 साल थी जबकि जब सुभाष इंग्लैंड से भारत लौटे तो वो 25 साल के हो चुके थे.

गांधी के साथ नेताजी सुभाष चंद्र बोस

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महात्मा गांधी के साथ नेताजी सुभाष चंद्र बोस

महात्मा गाँधी के प्रति दोनों की अलग-अलग धारणा

नेहरू की महात्मा गाँधी से पहली मुलाकात 1916 के लखनऊ कांग्रेस सम्मेलन में हुई थी. युवा जवाहरलाल गाँधी से पहली मुलाकात में ख़ास प्रभावित नहीं हुए थे लेकिन धीरे-धीरे वो गाँधी के मोहपाश में बँधते चले गए और उनका बहुत सम्मान करने लगे.

इसके ठीक विपरीत सुभाष चंद्र बोस पर गाँधी का कोई ख़ास असर नहीं पड़ा था.

मशहूर इतिहासकार रुद्रांग्शु मुखर्जी अपनी किताब 'नेहरू एंड बोस पैरेलल लाइव्स' में लिखते हैं, "1927 आते-आते दोनों के पैर राजनीति में जम चुके थे और दोनों ब्रिटिश भारतीय जेलों में अपनी पहली सज़ा काट आए थे. दोनों ने गाँधी के नेतृत्व को स्वीकार कर लिया था लेकिन बोस गांधी के असर में पूरी तरह से नहीं आए थे."

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वो लिखते हैं, "नेहरू सितंबर, 1921 में मोतीलाल नेहरू, गाँधी और दूसरे कांग्रेसी नेताओं के साथ कांग्रेस के विशेष सत्र में भाग लेने कलकत्ता आए थे."

"उस समय बोस चितरंजन दास के साथ काम कर रहे थे. अधिकतर कांग्रेसी नेता चितरंजन दास के घर पर ही ठहरे थे. इस बात की संभावना बहुत कम है कि उस दौरान जवाहरलाल नेहरू और सुभाष बोस की मुलाकात नहीं हुई होगी."

कमला नेहरू के अंतिम संस्कार में शामिल

बोस और जवाहरलाल की नज़दीकी तब बढ़ी जब उनकी पत्नी कमला नेहरू टीबी का इलाज कराने यूरोप गईं. उस समय जवाहरलाल जेल में बंद थे.

सुभाष बोस ख़ासतौर से कमला को देखने बाडेनवाइलर गए. जब कमला की हालत बिगड़ी तो नेहरू को जेल से रिहा कर दिया गया.

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सुगत बोस अपनी किताब 'हिज़ मेजेस्टीज़ अपोनेंट' में लिखते हैं, "जब नेहरू यूरोप पहुँचे तो बोस नेहरू से मिलने ब्लैक फ़ॉरेस्ट रिसॉर्ट गए और दोनों एक ही बोर्डिंग हाउस में रुके. जब कमला नेहरू की हालत थोड़ी बेहतर हुई तो सुभाष ऑस्ट्रिया चले गए."

वो आगे लिखते हैं, "वहाँ से उन्होंने नेहरू को पत्र लिखकर कहा कि अगर मैं आपकी परेशानी में थोड़ा-बहुत भी काम आ सकता हूँ तो मुझे बुलवा भेजने में हिचकिचाइएगा नहीं. जब 28 फ़रवरी, 1936 को स्विटज़रलैंड के शहर लुज़ान में कमला नेहरू ने अंतिम साँस ली तो जवाहरलाल नेहरू, सुभाष बोस और इंदिरा गाँधी वहाँ मौजूद थे."

वो लिखते हैं, "बोस ने ही कमला नेहरू के अंतिम संस्कार की व्यवस्था करवाई. नेहरू के दुखद दिनों में सुभाष की उनके पास उपस्थिति ने दोनों के बीच संबंधों को और घनिष्ठ कर दिया."

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जब जवाहरलाल नेहरू यूरोप में अपनी पत्नी कमला नेहरू की तीमारदारी में लगे हुए थे, उनको अप्रैल, 1936 में लखनऊ में होने वाले कांग्रेस अधिवेशन का अध्यक्ष चुन लिया गया.

उनको अध्यक्ष बनाने का विचार गाँधी का था. नेहरू के यूरोप रवाना होने से पहले गाँधी ने नेहरू को पत्र लिखकर कहा, "आपको अगले साल कांग्रेस के जहाज़ की कमान अपने हाथों में लेनी चाहिए."

कुछ दिनों बाद उन्होंने उनसे सीधे अनुरोध करके कहा, "मैं चाहता हूँ कि अगले साल आप अपने आप को कांग्रेस का अध्यक्ष बनने की अनुमति दें. आपकी रज़ामंदी कई मुश्किलों का हल निकाल देगी."

शुरू में नेहरू ने हाँ कहने में थोड़ी झिझक दिखाई लेकिन बाद में उन्होंने गाँधी के अनुरोध को स्वीकार कर लिया, लेकिन गाँधी के इस फ़ैसले पर कांग्रेस के कुछ हल्कों में विरोध के स्वर सुनाई दिए.

गाँधी से अपील की गई कि वो राजगोपालाचारी को नेहरू के खिलाफ़ चुनाव लड़ने की अनुमति दें, लेकिन गाँधी ने उनकी बात नहीं मानी और नेहरू को कुल 592 सदस्यों में 541 सदस्यों के वोट मिले.

जीत के बावजूद नेहरू पर हमले कम नहीं हुए. कावसजी जहाँगीर ने उन्हें पूरा का पूरा 'कम्युनिस्ट' कह कर पुकारा. होमी मोदी ने सचेत किया कि नेहरू मॉस्को की तरफ़ झुकने में ज़रा सी देर नहीं लगाएंगे.

नेहरू और गांधी

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नेहरू के दोबारा पार्टी अध्यक्ष बनने पर कांग्रेस में मतभेद

जब दिसंबर, 1936 में फ़ैज़पुर कांग्रेस सम्मेलन में नेहरू के दोबारा पार्टी अध्यक्ष चुनने का प्रस्ताव आया तो सरदार पटेल ने उसका ज़ोरदार विरोध किया.

पटेल ने गांधी के सचिव महादेव देसाई को पत्र लिखा जिसमें नेहरू को ऐसा 'सजा हुआ दूल्हा' कहा जो 'जितनी भी लड़कियाँ देखे, सबसे शादी करने के लिए तैयार है'.

देसाई की सलाह पर गाँधीजी ने राजगोपालाचारी को पत्र लिख कर कहा कि पटेल चाहते हैं कि आप कांग्रेस का काँटों भरा ताज पहनें. जब गोपालाचारी ने उनकी बात नहीं मानी तो पटेल ने गोविंद बल्लभ पंत का नाम सुझाया.

पटेल ने यहाँ तक कहा कि अगर जवाहरलाल पार्टी अध्यक्ष के पद पर बने रहते हैं तो उनके पास पार्टी की सदस्यता छोड़ देने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचेगा.

राजमोहन गाँधी सरदार पटेल की जीवनी 'पटेल' में लिखते हैं, "नेहरू ने कृपलानी के सामने गाँधी से अपने पद पर बने रहने की इच्छा जताई. उनका तर्क था कि काँग्रेस में जान फूँकने के लिए आठ महीने का कार्यकाल बहुत कम है. गाँधी ने इसका जवाब देते हुए कहा कि वो देखेंगे कि वो इस बारे में क्या कर सकते हैं. उन्होंने पटेल को नेहरू के खिलाफ़ चुनाव न लड़ने के लिए मना लिया."

गांधी और बोस

गांधी की सहमति से बोस कांग्रेस के अध्यक्ष बने

सन 1937 में कांग्रेस अध्यक्षता के लिए महात्मा गांधी ने सुभाष चंद्र बोस का नाम सुझाया. जब तक जवाहरलाल नेहरू कांग्रेस अध्यक्ष रहे सुभाष बोस या तो जेल में थे या विदेश में.

जब सुभाष बोस कांग्रेस अध्यक्ष बने तो नेहरू भारत में नहीं थे लेकिन इन दोनों में उस दौर में कोई वैचारिक मतभेद नहीं था. दोनों हिंदुओं-मुसलमानों के बीच किसी तरह का समझौता चाहते थे. यही कारण था कि 14 मई, 1938 को सुभाष ने मोहम्मद अली जिन्ना के बंबई स्थित निवास स्थान पर जाकर उनसे मुलाकात की, लेकिन इस बातचीत का कोई सकारात्मक परिणाम नहीं निकला.

नेहरू की तरह सुभाष चंद्र बोस ने भी एक और वर्ष के लिए कांग्रेस का अध्यक्ष बनने की इच्छा प्रकट की. इसका सबसे ज़ोरदार समर्थन रबींद्रनाथ टैगोर ने किया. उनकी नज़र में कांग्रेस में आधुनिक सोच के सिर्फ़ दो ही व्यक्ति थे, सुभाष और जवाहरलाल.

नेहरू चूँकि प्लानिंग कमेटी के अध्यक्ष थे इसलिए टैगोर चाहते थे कि बोस एक बार फिर कांग्रेस के अध्यक्ष बनें, लेकिन गांधी सुभाष चंद्र बोस को दोबारा कांग्रेस अध्यक्ष बनाने के पक्ष में नहीं थे.

गांधी और बोस

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बोस और गांधी का टकराव

गांधी के नज़दीकी पट्टाभि सीतारमैया को सुभाष बोस के खिलाफ़ चुनाव में उतारा गया. गाँधी का विरोध होने के बावजूद सुभाष बोस की जीत हुई. उन्हें कुल 1580 मत मिले जबकि सीतारमैया सिर्फ़ 1377 लोगों का ही समर्थन ले पाए.

बोस को अधिकतर मत बंगाल, मैसूर, पंजाब, उत्तर प्रदेश और मद्रास से मिले, लेकिन इस परिणाम के बाद आए महात्मा गांधी के बयान ने सबको चौंका दिया.

गाँधी ने कहा, "चूँकि मेरे कहने पर ही सीतारमैया इस मुकाबले से नहीं हटे थे, इसलिए ये हार, उनकी न होकर मेरी है."

रुद्रांग्शु मुखर्जी लिखते हैं, "सुभाष ने ये स्वीकार किया कि उन्हें गाँधीजी के इस बयान से चोट पहुँची है. उन्होंने ये साफ़ किया कि कांग्रेस सदस्यों से गाँधी के पक्ष या विपक्ष में वोट करने के लिए नहीं कहा गया था.

वो लिखते हैं, "गाँधी के साथ संबंधों के बारे में उन्होंने कहा कि कुछ मौकों पर गांधी के साथ उनके मतभेद रहे हैं, लेकिन इसके बावजूद मेरे अंदर उनके प्रति आदर में कभी कोई कमी नहीं आई है. मेरी पूरी कोशिश होगी कि मैं भारत के इस महानतम व्यक्ति का विश्वास जीत सकूँ."

सुभाष चंद्र बोस

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नेहरू और सुभाष के बीच मतभेद बढ़े

यहाँ से सुभाष और नेहरू के बीच मतभेदों की शुरुआत हुई. फ़रवरी के आरंभिक दिनों में नेहरू और सुभाष के बीच एक घंटे तक शांतिनिकेतन में एक मुलाकात हुई.

इस मुलाकात में क्या बातचीत हुई उसका कोई रिकार्ड तो नहीं मिलता लेकिन इसके बाद नेहरू ने बोस को जो पत्र लिखा, उसका रिकार्ड ज़रूर है.

रुद्रांग्शु मुखर्जी लिखते हैं, "नेहरू को कांग्रेस के अंदर के लोगों के लिए सुभाष बोस की ओर से 'वामपंथी' और 'दक्षिणपंथी' शब्द के इस्तेमाल पर आपत्ति थी. नेहरू की नज़र में इन शब्दों से ये आभास मिलता था कि गाँधी और उनका समर्थन करने वाले लोग दक्षिणपंथी ख़ेमे से हैं और जो उनका विरोध कर रहे हैं वो वामपंथी हैं."

वो लिखते हैं, "नेहरू ने इस पत्र में हिंदु-मुसलमानों, किसानों, मज़दूरों और विदेश नीति के मुद्दे भी उठाए. नेहरू जानना चाहते थे कि क्या इन मुद्दों पर सुभाष की राय कांग्रेस के उनके साथियों से अलग है? नेहरू की राय थी कि इस सबका सबसे अच्छा समाधान है कि सुभाष बोस इस बारे में एक स्पष्टीकरण नोट जारी करें."

गाधी, सुभाष और बल्लभ भाई पटेल

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सरदार पटेल और पंत ने किया सुभाष का विरोध

उधर सरदार पटेल भी तब तक सुभाष बोस के विरोधी बन चुके थे. राजमोहन गांधी लिखते हैं, "पटेल ने राजेंद्र प्रसाद को पत्र लिखकर कहा कि बोस के साथ काम करना असंभव हो गया है और वो चाहते भी हैं कि पार्टी को चलाने में उन्हें खुली छूट दी जाए."

जब 22 फ़रवरी को वर्धा में कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक हुई तो उसमें सुभाष बोस बीमारी की वजह से हिस्सा नहीं ले पाए.

गाँधी के कहने पर नेहरू और शरद चंद्र बोस को छोड़कर पटेल समेत कार्यसमिति के सभी सदस्यों ने इस्तीफ़ा दे दिया. इसके बाद 10 से 12 मार्च के बीच त्रिपुरी में कांग्रेस की बैठक हुई जिसमें बुखार होने के बावजूद बोस भाग लेने पहुंचे.

गाँधी ने बैठक में भाग नहीं लिया क्योंकि वो उस समय राजकोट में उपवास कर रहे थे.

पट्टाभि सीतारमैया अपनी किताब 'हिस्ट्री ऑफ़ द कांग्रेस' में लिखते हैं, "गोविंदवल्लभ पंत ने प्रस्ताव पेश किया जिसमें कहा गया कि कांग्रेस गाँधी की मूलभूत नीतियों के प्रति प्रतिबद्ध है. इसमें पिछले एक साल से काम कर रही कार्यसमिति के काम में विश्वास प्रकट किया गया और अध्यक्ष से अनुरोध किया गया कि वो गांधी की इच्छा के अनुसार कार्यसमिति का गठन करें."

सुभाष चंद्र बोस

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बोस ने नेहरू को 27 पन्नों का पत्र भेजा

जब सुभाष महात्मा गाँधी के साथ अपने मतभेदों को दूर करने की कोशिश कर रहे थे, उन्होंने जवाहरलाल नेहरू को 27 पन्नों का एक टाइप किया हुआ पत्र लिखा.

उसका पहला ही वाक्य था, "पिछले कुछ समय से मुझे लग रहा है कि आप मुझे बहुत नापसंद करने लगे हैं."

आगे उन्होंने लिखा, "जब से मैं 1937 में जेल से बाहर आया हूँ, निजी और सार्वजनिक ज़िदगी में मैंने हमेशा आपका सम्मान किया है. मैंने हमेशा आपको अपना बड़ा भाई समझा है और अक्सर आपकी सलाह ली है. लेकिन मेरे प्रति आपका रवैया हमेशा अस्पष्ट रहा है."

पूरे पत्र का लहजा कड़ुवाहट से भरा हुआ था. 26 जनवरी को नेहरू के बयान का ज़िक्र करते हुए सुभाष ने लिखा, "आपने कहा कि हमें नीतियों और योजनाओं पर बात करनी चाहिए, व्यक्तियों पर नहीं."

ओरलांडो मज़ोटा के पासपोर्ट पर नेताजी की यही तस्वीर चिपकाई गई थी

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ओरलांडो मज़ोटा के पासपोर्ट पर नेताजी की यही तस्वीर चिपकाई गई थी

उन्होंने लिखा, "जब कुछ ख़ास लोगों का ज़िक्र हो, तब तो आप चाहते हैं कि हम लोगों को भूल जाएँ, लेकिन जब सुभाष बोस दोबारा चुनाव में खड़े होते हैं, तब तो आप व्यक्तित्व को नज़रअंदाज़ कर सिद्धांतों की बात करते हैं, लेकिन जब मौलाना आज़ाद दोबारा चुनाव लड़ने की बात करते हैं तो आपको उनके क़सीदे पढ़ने से कोई परहेज़ नहीं करते."

सुभाष को ख़ासतौर से 22 फ़रवरी को नेहरू के कांग्रेस कार्यसमिति के 12 सदस्यों के इस्तीफ़े के बाद दिए गए बयान पर एतराज़ था. सुभाष का कहना था कि ये आपके व्यक्तित्व को शोभा नहीं देता. (नेताजी कलेक्टेड वर्क्स, भाग 9 )

गांधी और नेहरू

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कांग्रेस पार्टी की मीटिंग 9 अगस्त 1942.

सुभाष का 'बड़बोलापन' बुरा लगा

जवाहरलाल नेहरू ने इस पत्र का जवाब देते हुए सुभाष बोस की स्पष्टवादिता की तारीफ़ की. उन्होंने लिखा, "स्पष्टवादिता कुछ लोगों को चोट पहुँचा सकती है लेकिन ये ज़रूरी है, ख़ासतौर से उन लोगों के बीच, जिन्हें साथ-साथ काम करना है. निजी तौर पर आपके प्रति मेरे मन में हमेशा स्नेह और सम्मान रहा है और अब भी है, बावजूद इसके कि कभी-कभी मैंने आपके काम और आपके काम करने के तरीके को पसंद नहीं किया है."

पत्र के अगले भाग में उन्होंने सुभाष बोस के मुद्दों का सिलसिलेवार जवाब दिया. रुद्रांग्शु मुखर्जी लिखते हैं, "कभी-कभी नेहरू को सुभाष का कथित बड़बोलापन अरुचिकर लगता था."

नेहरू ने सुभाष बोस को लिखे एक पत्र में लिखा, "मुझे लगा कि आप कांग्रेस का दोबारा अध्यक्ष बनने के लिए कुछ ज़्यादा ही आतुर हैं. राजनीतिक रूप से इसमें कुछ भी ग़लत नहीं है और आपको दोबारा चुनाव लड़ने और इसके लिए काम करने का पूरा अधिकार है लेकिन मुझे इससे पीड़ा हुई क्योंकि मेरा मानना है कि आप इन सब चीज़ों से कहीं ऊपर हैं."

सुभाष चंद्र बोस

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सुभाष और गाँधी के बीच मतभेद बरकरार रहे

लेकिन इस पत्राचार के बावजूद सुभाष ने गाँधी और नेहरू को मनाने के अपने प्रयास कम नहीं किए. जून में वो गाँधी से मिलने वर्धा गए और वहीं गाँधी और सुभाष की आख़िरी मुलाकात हुई.

लेकिन इस मुलाकात का कोई सकारात्मक परिणाम नहीं निकला. सुभाष के प्रति गांधी के विचार और दृढ़ होते गए.

दिसंबर, 1939 में टैगोर ने गाँधीजी को तार भेजकर कहा कि वो सुभाष पर लगे प्रतिबंध को उठा लें, तो गाँधीजी ने उसके जवाब में कहा कि उन्हें चाहिए कि वो सुभाष बोस को अनुशासन में रहने की सीख दें.

जनवरी, 1940 में सीएफ़ एंड्रूज़ को लिखे पत्र में गाँधी ने टैगोर के इस तार का ज़िक्र करते हुए लिखा, "मुझे लगता है कि सुभाष परिवार के बिगड़े हुए बच्चे की तरह व्यवहार कर रहे हैं. मुझे ये साफ़ है कि इस जटिल मामले को सुलझाना गुरुदेव के बस का नहीं है." (गांधी कलेक्टेड वर्क्स, खंड 71 )

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रविंद्रनाथ टैगोर के साथ सुभाष के भाई शरद चंद्र बोस और सुभाष

सुभाष की मौत की ख़बर सुनकर नेहरू हुए भावुक

अंतत: सुभाष बोस को कांग्रेस से इस्तीफ़ा देना पड़ा. उन्होंने एक नई पार्टी फ़ॉरवर्ड ब्लॉक का गठन किया. सन 1941 में सुभाष बोस गुप्त रूप से भारत से बाहर जाने में सफल हो गए.

वो अफ़गानिस्तान होते हुए जर्मनी पहुंचे जहाँ उन्होंने हिटलर से मुलाकात की.

कांग्रेस में नेता बनने का मौका न मिलने के बावजूद उन्होंने 1943-44 में दिखाया कि वो क्या कुछ कर सकते हैं.

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नेताजी सुभाष चंद्र बोस अपने भाई शरद चंद्र बोस और माँ प्रभाबती के साथ अपने घर में

उन्होंने आज़ाद हिंद फ़ौज (आइएनए) का नेतृत्व किया. बचपन से ही उन्हें सैनिक करियर की चाह रही थी. उन्होंने अपने जीवन के आख़िरी कुछ वर्ष सैनिक वर्दी में बिताए.

इस दौरान नेहरू 9 अगस्त, 1942 से 15 जून, 1945 तक जेल में रहे. ये उनके जीवन का सबसे लंबा जेल प्रवास था. जब नेहरू को विमान दुर्घटना में सुभाष बोस के निधन की ख़बर मिली तो वो रो पड़े.

भावुक होकर उन्होंने कहा, "सुभाष अब उन सब मुसीबतों से कहीं दूर चले गए हैं जिनका बहादुर सैनिकों का अपने जीवन में सामना करना पड़ता है. मैं कई मामलों में सुभाष से सहमत नहीं था लेकिन भारत की आज़ादी के लिए संघर्ष में उनकी ईमानदारी में कोई संदेह नहीं था."

हिटलर के साथ सुभाष चंद्र बोस

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जर्मनी में हिटलर के साथ सुभाष चंद्र बोस.

रेजीमेंट का नाम नेहरू के नाम पर रखा

सुभाष के साथ मतभेद के बावजूद नेहरू सुभाष के साथ बिताए दिनों को कभी भुला नहीं पाए. सुभाष के मन में भी अंतिम समय तक नेहरू के मन में सम्मान रहा, तभी तो उन्होंने आजाद हिंद फ़ौज की एक रेजिमेंट का नाम 'नेहरू रेजिमेंट' रखा.

दूसरा विश्व युद्ध समाप्त हो जाने के बाद जब अंग्रेज़ सरकार ने आज़ाद हिंद फ़ौज के सैनिकों पर दिल्ली के लाल किले में मुकदमा चलाया तो जवाहरलाल नेहरू ने 25 सालों बाद अपना वकील का गाउन पहना और अदालत में पुरज़ोर तरीके से इन सैनिकों की पैरवी की.

सुभाष चंद्र बोस

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रुद्रांग्शु मुखर्जी लिखते हैं, "सुभाष को विश्वास था कि वो और नेहरू मिलकर इतिहास बना सकते हैं, लेकिन नेहरू गाँधी के बिना अपना भविष्य देखने के लिए तैयार नहीं थे. बोस नेहरू संबंधों के प्रगाढ़ न हो पाने की सबसे बड़ी वजह यही थी."

नेहरू सुभाष संबंधों को भारतीय राजनीति की एक बड़ी प्रतिद्वंदिता के तौर पर देखा जाता है. ये प्रतिद्वंदिता और आगे भी चलती लेकिन नियति ने बोस को भारत के राजनीतिक पटल से हटा दिया.

कुछ लोगों की सोच है कि अगर सुभाष जीवित होते तो वो आज़ाद भारत के पहले प्रधानमंत्री बनने के प्रबल दावेदार होते और ये देखना दिलचस्प होता कि भारत के नेतृत्व की ज़िम्मेदारी नेहरू को मिलती या सुभाषचंद्र बोस को.

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♻ *कन्या पूजन से सभी तरह के वास्तु दोष,विघ्न, भय और शत्रुओं का नाश होता है।*⚱ *नवरात्रि में कन्या पूजन में ध्यान रखे कि कन्याओ की उम्र दो वर्ष से कम और दस वर्ष से ज्यादा भी न हो ।*⚱ *शास्त्रों के अनुसार दो वर्ष की कन्या kanya को कुमारी कहा गया है । कुमारी के पूजन से सभी तरह के दुखों और दरिद्रता का नाश होता है ।*⚱ *तीन वर्ष की कन्या को त्रिमूर्ति माना गया है । त्रिमूर्ति के पूजन poojan से धन लाभ होता है ।*⚱ *चार वर्ष की कन्या को कल्याणी कहते है । कल्याणी के पूजन poojan से जीवन के सभी क्षेत्रों में सफलता और सुख समृद्धि की प्राप्ति होती है ।* ⚱ *पांच वर्ष की कन्या kanya को रोहिणी कहा गया है । माँ के रोहणी स्वरूप की पूजा करने से जातक के घर परिवार से सभी रोग दूर होते है।*⚱ *छः वर्ष की कन्या kanya को काली कहते है । माँ के इस स्वरूप की पूजा करने से ज्ञान, बुद्धि, यश और सभी क्षेत्रों में विजय की प्राप्ति होती है ।*⚱ *सात वर्ष की कन्या को चंडिका कहते है । माँ चण्डिका के इस स्वरूप की पूजा करने से धन, सुख और सभी तरह की ऐश्वर्यों की प्राप्ति होती है ।*⚱ *आठ वर्ष की कन्या को शाम्भवी कहते है । शाम्भवी की पूजा करने से युद्ध, न्यायलय में विजय और यश की प्राप्ति होती है ।*⚱ *नौ वर्ष की कन्या को दुर्गा का स्वरूप मानते है । माँ के इस स्वरूप की अर्चना करने से समस्त विघ्न बाधाएं दूर होती है, शत्रुओं का नाश होता है और कठिन से कठिन कार्यों में भी सफलता प्राप्त होती है ।*⚱ *दस वर्ष की कन्या को सुभद्रा स्वरूपा माना गया हैं। माँ के इस स्वरूप की आराधना करने से सभी मनवाँछित फलों की प्राप्ति होती है और सभी प्रकार के सुख प्राप्त होते है ।*⚱ *इसीलिए नवरात्र के इन नौ दिनों तक प्रतिदिन इन देवी स्वरुप कन्याओं को अपनी श्रद्धा और सामर्थ्य से भेंट देना अति शुभ माना जाता है। इन दिनों इन नन्ही देवियों को फूल, श्रंगार सामग्री, मीठे फल (जैसे केले, सेब,नारियल आदि), मिठाई, खीर , हलवा, कपड़े, रुमाल,रिबन, खिलौने, मेहंदी आदि उपहार में देकर मां दुर्गा की अवश्य ही कृपा प्राप्त की जा सकती है ।*By वनिता कासनियां पंजाब⚱ *इन उपरोक्त रीतियों के अनुसार माता की पूजा अर्चना करने से देवी मां प्रसन्न होकर हमें सुख, सौभाग्य,यश, कीर्ति, धन और अतुल वैभव का वरदान देती है।*भगवान श्री राम को 14 वर्ष का वनवास हुआ तो उनकी पत्नी माँ सीता ने भी सहर्ष वनवास स्वीकार कर लिया।परन्तु बचपन से ही बड़े भाई की सेवा मे रहने वाले लक्ष्मण जी कैसे राम जी से दूर हो जाते! माता सुमित्रा से तो उन्होंने आज्ञा ले ली थी, वन जाने की.. परन्तु जब पत्नी उर्मिला के कक्ष की ओर बढ़ रहे थे तो सोच रहे थे कि माँ ने तो आज्ञा दे दी, परन्तु उर्मिला को कैसे समझाऊंगा!! क्या कहूंगा!! यदि बिना बताए जाऊंगा तो रो रोके जान दे देगी और यदि बताया तो साथ जाने की ज़िद्द करने लगेगी और कहेगी कि यदि सीता जी अपने पति के साथ जा सकती हैं तो मैं क्यों नहीं!!यहीं सोच विचार करके लक्ष्मण जी जैसे ही अपने कक्ष में पहुंचे तो देखा कि उर्मिला जी आरती का थाल लेके खड़ी थीं और बोलीं- "आप मेरी चिंता छोड़ प्रभु की सेवा में वन को जाओ। मैं आपको नहीं रोकुंगीं। मेरे कारण आपकी सेवा में कोई बाधा न आये, इसलिये साथ जाने की जिद्द भी नहीं करूंगी।"लक्ष्मण जी को कहने में संकोच हो रहा था। परन्तु उनके कुछ कहने से पहले ही उर्मिला जी ने उन्हें संकोच से बाहर निकाल दिया।वास्तव में यहीं पत्नी का धर्म है। पति संकोच में पड़े, उससे पहले ही पत्नी उसके मन की बात जानकर उसे संकोच से बाहर कर दे!पत्नी का इतना त्याग और प्रेम देखकर लक्ष्मण जी भी रो पड़े। उर्मिला जी ने एक दीपक जलाया और विनती की कि मेरी इस आस को कभी बुझने नहीं देना। लक्ष्मण जी तो चले गये परन्तु 14 वर्ष तक उर्मिला जी ने एक तपस्विनी की भांति कठोर तप किया। वन में भैया-भाभी की सेवा में लक्ष्मण जी कभी सोये नहीं परन्तु उर्मिला ने भी अपने महलों के द्वार कभी बंद नहीं किये और सारी रात जाग जागकर उस दीपक की लौ को बुझने नहीं दिया। मेघनाथ से युद्ध करते हुए जब लक्ष्मण को शक्ति लग जाती है और हनुमान जी उनके लिये संजीवनी का पहाड़ लेके लौट रहे होते हैं, तो बीच में अयोध्या में भरत जी उन्हें राक्षस समझकर बाण मारते हैं और हनुमान जी गिर जाते हैं। तब हनुमान जी सारा वृत्तांत सुनाते हैं कि सीता जी को रावण ले गया, लक्ष्मण जी मूर्छित हैं। यह सुनते ही कौशल्या जी कहती हैं कि राम को कहना कि लक्ष्मण के बिना अयोध्या में पैर भी मत रखना। राम वन में ही रहे।माता सुमित्रा कहती हैं कि राम से कहना कि कोई बात नहीं। अभी शत्रुघ्न है। मैं उसे भेज दूंगी। मेरे दोनों पुत्र राम सेवा के लिये ही तो जन्मे हैं।माताओं का प्रेम देखकर हनुमान जी की आँखों से अश्रुधारा बह रही थी। परन्तु जब उन्होंने उर्मिला जी को देखा तो सोचने लगे कि यह क्यों एकदम शांत और प्रसन्न खड़ी हैं? क्या इन्हें अपनी पति के प्राणों की कोई चिंता नहीं?हनुमान जी पूछते हैं- देवी! आपकी प्रसन्नता का कारण क्या है? आपके पति के प्राण संकट में हैं। सूर्य उदित होते ही सूर्य कुल का दीपक बुझ जायेगा। उर्मिला जी का उत्तर सुनकर तीनों लोकों का कोई भी प्राणि उनकी वंदना किये बिना नहीं रह पाएगा।वे बोलीं- "मेरा दीपक संकट में नहीं है, वो बुझ ही नहीं सकता। रही सूर्योदय की बात तो आप चाहें तो कुछ दिन अयोध्या में विश्राम कर लीजिये, क्योंकि आपके वहां पहुंचे बिना सूर्य उदित हो ही नहीं सकता।आपने कहा कि प्रभु श्रीराम मेरे पति को अपनी गोद में लेकर बैठे हैं। जो योगेश्वर राम की गोदी में लेटा हो, काल उसे छू भी नहीं सकता। यह तो वो दोनों लीला कर रहे हैं। मेरे पति जब से वन गये हैं, तबसे सोये नहीं हैं। उन्होंने न सोने का प्रण लिया था। इसलिए वे थोड़ी देर विश्राम कर रहे हैं। और जब भगवान् की गोद मिल गयी तो थोड़ा विश्राम ज्यादा हो गया। वे उठ जायेंगे।और शक्ति मेरे पति को लगी ही नहीं शक्ति तो राम जी को लगी है। मेरे पति की हर श्वास में राम हैं, हर धड़कन में राम, उनके रोम रोम में राम हैं, उनके खून की बूंद बूंद में राम हैं, और जब उनके शरीर और आत्मा में हैं ही सिर्फ राम, तो शक्ति राम जी को ही लगी, दर्द राम जी को ही हो रहा। इसलिये हनुमान जी आप निश्चिन्त होके जाएँ। सूर्य उदित नहीं होगा।"वास्तव में सूर्य में भी इतनी ताकत नहीं थी कि लक्ष्मण जी के जागने से पहले वो उदित हो जाते! एक पतिव्रता तपस्विनी का तप उनके सामने खड़ा था। और मेघनाथ को भी लक्ष्मण जी ने नहीं, अयोध्या में बैठी एक तपस्विनी उर्मिला ने मारा।राम राज्य की नींव जनक की बेटियां ही थीं... कभी सीता तो कभी उर्मिला। भगवान् राम ने तो केवल राम राज्य का कलश स्थापित किया परन्तु वास्तव में राम राज्य इन सबके प्रेम, त्याग, समपर्ण, बलिदान से ही आया,,*।।जय जय श्री राम।।**।।हर हर महादेव।।*भगवान श्री राम का सेवक वनिता कासनियां पंजाब

♻ *कन्या पूजन से सभी तरह के वास्तु दोष,विघ्न, भय और शत्रुओं का नाश होता है।* ⚱ *नवरात्रि में कन्या पूजन में ध्यान रखे कि कन्याओ की उम्र दो वर्ष से कम और दस वर्ष से ज्यादा भी न हो ।* ⚱ *शास्त्रों के अनुसार दो वर्ष की कन्या kanya को कुमारी कहा गया है । कुमारी के पूजन से सभी तरह के दुखों और दरिद्रता का नाश होता है ।* ⚱ *तीन वर्ष की कन्या को त्रिमूर्ति माना गया है । त्रिमूर्ति के पूजन poojan से धन लाभ होता है ।* ⚱ *चार वर्ष की कन्या को कल्याणी कहते है । कल्याणी के पूजन poojan से जीवन के सभी क्षेत्रों में सफलता और सुख समृद्धि की प्राप्ति होती है ।*   ⚱ *पांच वर्ष की कन्या kanya को रोहिणी कहा गया है । माँ के रोहणी स्वरूप की पूजा करने से जातक के घर परिवार से सभी रोग दूर होते है।* ⚱ *छः वर्ष की कन्या kanya को काली कहते है । माँ के इस स्वरूप की पूजा करने से ज्ञान, बुद्धि, यश और सभी क्षेत्रों में विजय की प्राप्ति होती है ।* ⚱ *सात वर्ष की कन्या को चंडिका कहते है । माँ चण्डिका के इस स्वरूप की पूजा करने से धन, सुख और सभी तरह की ऐश्वर्यों की प्राप्ति होती है ।* ⚱ *आठ वर्ष की कन्या को शाम्भवी कह...

'जय जवान-जय किसान’ के उद्‍घोषक,पूर्व प्रधानमंत्री भारत रत्न लाल बहादुर शास्त्री जी की जयंती पर कोटि-कोटि नमन।सरलता व सादगी के प्रतीक शास्त्री जी ने अपने प्रेरणादायी विचारों से जन-जन में राष्ट्रीयता व देशप्रेम का संचार किया। (वनिता कासनियां पंजाब द्वारा) उनका दूरदर्शी व्यक्तित्व समाज के लिए प्रेरणास्रोत हैं।सत्य, सद्भाव और अहिंसा के अद्भुत मंत्र द्वारा भारतवासियों को स्वतंत्रता के लिए जागृत करने वाले सादगी एवं सदाचार के प्रतीक राष्ट्रपिता #महात्मा_गांधी जी एवं भारत रत्न, सादगीपूर्ण, दूरदर्शी व निडर व्यक्तित्व, पूर्व प्रधानमंत्री #लाल_बहादुर_शास्त्री जी की संघर्ष पूरे देश को प्रेरित करता है। ''जय जवान जय किसान’' के ओजस्वी नारे ने भारत की समृद्धि व सुरक्षा के दो सबसे बड़े स्तंभ है...जयंती पर उन्हें कोटि-कोटि नमन।🌷🙏'जय जवान-जय किसान' जैसे ऊर्जावान मंत्र के उद्घोषक, व्यक्तिगत और राजनीतिक जीवन में शुचिता, सरलता, सादगी और कर्तव्यनिष्ठा के प्रतीक पुरुष, पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री जी की जयंती पर उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि। उनका त्यागमय जीवन भारतीय राजनीति के लिए एक आदर्श है।'जय जवान-जय किसान' जैसे ऊर्जावान मंत्र के उद्घोषक, व्यक्तिगत और राजनीतिक जीवन में शुचिता, सरलता, सादगी और कर्तव्यनिष्ठा के प्रतीक पुरुष, पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री जी की जयंती पर उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि। उनका त्यागमय जीवन भारतीय राजनीति के लिए एक आदर्श है।उन्होंने मां को नहीं बताया था कि वो रेल मंत्री हैं।कहा था कि "मैं रेलवे में नौकरी करता हूं"।वह एक बार किसी कार्यक्रम में आए थे जब उनकी मां भी वहां पूछते पूछते पहुंची कि मेरा बेटा भी आया है, वह भी रेलवे में है।लोगों ने पूछा क्या नाम है जब उन्होंने नाम बताया तो सब चौंक गए " बोले यह झूठ बोल रही है"।पर वह बोली, "नहीं वह आए हैं"।लोगों ने उन्हें लाल बहादुर शास्त्री जी के सामने ले जाकर पूछा," क्या वही है?"तो मां बोली "हां वह मेरा बेटा है"लोग मंत्री जी से दिखा कर बोले "क्या वह आपकी मां है"तब शास्त्री जी ने अपनी मां को बुला कर अपने पास बिठाया और कुछ देर बाद घर भेज दिया।तो पत्रकारों ने पूछा "आपने उनके सामने भाषण क्यों नहीं दिया"तो वह बोले-मेरी मां को नहीं पता कि मैं मंत्री हूं। अगर उन्हें पता चल जाए तो वह लोगों की सिफारिश करने लगेगी और मैं मना भी नहीं कर पाऊंगा।..... और उन्हें अहंकार भी हो जाएगा।जवाब सुनकर सब सन्न रह गए।"कहां गए वो निस्वार्थि ,सच्चे ,ईमानदार लोग"हम सदैव स्वर्गीय श्री लाल बहादुर शास्त्री जी को अपना आदर्श मानकर कार्य करते रहेंगे"।आज है लाल बहादुर शास्त्री जी का जन्म दिन🙏🙏

'जय जवान-जय किसान’ के उद्‍घोषक,पूर्व प्रधानमंत्री भारत रत्न लाल बहादुर शास्त्री जी की जयंती पर कोटि-कोटि नमन। वनिता कासनियां पंजाब द्वारा सरलता व सादगी के प्रतीक शास्त्री जी ने अपने प्रेरणादायी विचारों से जन-जन में राष्ट्रीयता व देशप्रेम का संचार किया। उनका दूरदर्शी व्यक्तित्व समाज के लिए प्रेरणास्रोत हैं। सत्य, सद्भाव और अहिंसा के अद्भुत मंत्र द्वारा भारतवासियों को स्वतंत्रता के लिए जागृत करने वाले सादगी एवं सदाचार के प्रतीक राष्ट्रपिता #महात्मा_गांधी जी एवं भारत रत्न, सादगीपूर्ण, दूरदर्शी व निडर व्यक्तित्व, पूर्व प्रधानमंत्री #लाल_बहादुर_शास्त्री जी की संघर्ष पूरे देश को प्रेरित करता है। ''जय जवान जय किसान’' के ओजस्वी नारे ने भारत की समृद्धि व सुरक्षा के दो सबसे बड़े स्तंभ है.. 'जय जवान-जय किसान' जैसे ऊर्जावान मंत्र के उद्घोषक, व्यक्तिगत और राजनीतिक जीवन में शुचिता, सरलता, सादगी और कर्तव्यनिष्ठा के प्रतीक पुरुष, पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री जी की जयंती पर उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि।  उनका त्यागमय जीवन भारतीय राजनीति के लिए एक आ...